गुरुवार, अक्तूबर 1

साँसे जब लापता होंगी

दिल में बसी तमन्ना ये जब जवां होगी,
उससे ज्यादा खूबसूरत चीज क्या होगी

निकल पड़ते हैं अश्क इस दर्द के होने से
कल मेरी गम ही मेरे गम की दवा होगी

आज रो पड़ता हूँ मै हर शरारत पे तेरी
कल हसूंगा जिसपे वो तेरी ही अदा होगी

हो जायेंगे एक हम दोनों आग की गवाही से
सर पे मेरे सेहरा ओर तेरे हाथों पे हिना होगी

फ़िर जमाने में कहीं भी हम नजर न आयेंगे,
अजनबी बन के ये साँसे जब लापता होंगी

2 टिप्‍पणियां:

raj ने कहा…

फ़िर जमाने में कहीं भी हम नजर न आयेंगे,
अजनबी बन के ये साँसे जब लापता होंगी ...ik kadwi haqeekat jo samne aati hi hai...hume is duniya se jana hi hai......fir lapta ho jana hai....

अल्पना वर्मा ने कहा…

बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है.