शनिवार, फ़रवरी 20

मुझको इंसान होने पे हया आती है





मुझ को इंसान होने पर हया आती है -/
सिर्फ हया ही आती है तो क्या आती है -/

कभी तो खुदा को मस्जिद खैरात करता है ,
कभी उसे ढहा कर मंदिर की बात करता हैं ,
मज़हब पे सेंकता है खुदगर्जी की रोटियां
khudgarz insaan होने पर हया आती है -/


कभी बुद्ध या मसीह के बुत ईज़ाद करता है
कभी उनसे ही होके बागी उन्हें बर्बाद करता है
मिटाता जा रहा है चमन से निशां अमन के
ऐसा बर्बाद इंसान होने पे हया आती है -/

करता है कभी इबादत धर्मो रिवाज़ के लिए
कभी काटता है सर दंगो के आगाज़ के लिए
हलाल किया मजलूम को खुदा के नाम पर
ऐसा कातिल इंसान होने पे हया आती है -/

मुझ को इंसान होने पे हया आती है -/
सिर्फ हया ही आती है तो क्या आती है -/



5 टिप्‍पणियां:

manu ने कहा…

apne insan ka kala paksh darshaya hai yakeenan vo haya k layak hai
dua kare ki hme haya aye aur us e dohrane ki koshish na ho to ye insan is duniya ki sabse khubsurat kriti ban jayega

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इंसान की हरकतें आज कुछ ऐसी हैं की सच में खुद पर शर्म आती है ... बहुत अच्छा लिखा है ....

vikas ने कहा…

बहुत ही उच्च पक्तियां,सुन्दर अभिव्यक्ति.

विकास पाण्डेय
www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

deepti ने कहा…

bahut achcha likha apney.

deepti ने कहा…

bahut achcha likha apney.