शुक्रवार, सितंबर 19

"इन्तेहाँ"




इंतज़ार की भी इन्तेहाँ देखिये
और वो आए नही यहाँ देखिये

खड़े हैं जहाँ मुकर्र था मिलना,
इसके सिवा और कहाँ देखिये

एक जुम्बिश से गुजर रहा दिल ,
आँखें कहे के सारा जहाँ देखिये

मज़बूरी है, बेवफाई है या क्या ?
कशमकश बीच जेहनो जबाँ देखिये

आ गए वो ज़मीं पर फिरदौस बनकर ,
खुशरंग रेज़े रेज़े सारा जहाँ देखिये

7 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

इंतज़ार की भी इन्तेहाँ देखिये
और वो आए नही यहाँ देखिये
" bhut hee khubsuret khyal"

Regards

*KHUSHI* ने कहा…

har ek line mai inteha basi hai...
bahut hi khubsurtise pesh kiya hai

Prakash singh "Arsh" ने कहा…

umda ,bahot khub sundar,main yahan kisi bhi sher ko apke samane nahi rakhunga ,har lafja mukammal hai..muje ese hi ghazal ka intazar tha aapse..bahot hi umda ghazal hai ......aapke is sundar rachana ke liye apko badhai.........


regards
Arsh

shyam kori 'uday' ने कहा…

bahut achchhaa blog hai,lekhanee bhee prabhaavashaalee hai|

RC ने कहा…

Thanks four comments on my blog.

रंजना ने कहा…

वाह....बहुत सुंदर...

"SURE" ने कहा…

thanks to all