शुक्रवार, फ़रवरी 20

मुहब्बत का मशवरा

प्यार भी उनसे बहुत और फासले बहुत
आँख में आंसू मगर दिल में होंसले बहुत
संभल कर रहना जरा कांच की तरह
होतें है तेरे शहर में सुना हादसे बहुत
मिल कर जुदा होना जुदा होके फिर मिलना
प्यार में आते है अक्सर ऐसे सिलसिले बहुत
तेरे प्यार की इक तन्हाई पाने के लिए
छोड़ आया हूँ पीछे अपने महफिलें बहुत
मुहब्बत न करो हमसे यूँ टूट कर अभिन्न
आती है इसकी राह में सदा मुश्किलें बहुत

12 टिप्‍पणियां:

"अर्श" ने कहा…

बहोत ही शानदार लिखा है आपने भाई साहब
बहोत ही खूबसूरती से पेश किया है ढेरो बधाई कुबूल करें...

अर्श

Puneet Sahalot ने कहा…

hello bhaiya..!!
bahut hi achhi lagi aapki ye nayi rachna... :)

sachha pyar jhalak raha hai..
"तेरे प्यार की इक तन्हाई पाने के लिए
छोड़ आया हूँ पीछे अपने महफिलें बहुत"

Puneet Sahalot ने कहा…

ek baat to bhul hi gaya...!!!

chhote bhai ki ichha puri karne
k liye bahut bahut dhanyawaad... :)

manu ने कहा…

मिल कर जुदा होना जुदा होके फिर मिलना
प्यार में आते है अक्सर ऐसे सिलसिले बहुत
bahut khoob likha hai
juda hoke milne me jo sukh hai vo bayan nai ho sakta bus mahsus kiya ja sakta hai ......

गौतम राजरिशी ने कहा…

अच्छा है साहब

seema gupta ने कहा…

मिल कर जुदा होना जुदा होके फिर मिलना
प्यार में आते है अक्सर ऐसे सिलसिले बहुत
"REGARDS"

Dev ने कहा…

तेरे प्यार की इक तन्हाई पाने के लिए
छोड़ आया हूँ पीछे अपने महफिलें बहुत

kya bat kahi hai aapne ... pyar ki ek sundar kavita. Aapka pyar esi tarah badhata rahe...
Badhi...

purnima ने कहा…

प्यार भी उनसे बहुत और फासले बहुत
आँख में आंसू मगर दिल में होंसले बहुत.........
"तेरे प्यार की इक तन्हाई पाने के लिए
छोड़ आया हूँ पीछे अपने महफिलें बहुत"

Babli ने कहा…

बहुत बढिया!! इसी तरह से लिखते रहिए !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना!आप
का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को
ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन
है कि आप को ये पसंद आयेंगे।

SHASHANKE ने कहा…

किस जुबान से कहूँ के है हमको तुमसे मोहब्बत बहुत
देखे हैं इस ज़माने में हमने बदलते अफसाने बहुत
एक तू ही नहीं मेरी बेबसी का सबब,
ज़माने में हैं ऐसे तमाशाई बहुत

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

बहुत शान्दार अभिन्न

इश्क फ़ूलों का चमन ही तो नहीं,
राह कान्टों की है हर ज़माने में।

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