रविवार, जून 28

जल नही तो जल रहे हैं



जल नहीं है तो जल रहे है
ये मौसम हमको तल रहे है

तप रही आग सी सारी धरती
आसमान तो जैसे पिघल रहे है

आती है बिजली जाने के लिए
पंखे तो हाथ के ही चल रहे है

कतार मोहल्ला हो गया सारा
नखरे में नुक्कड़ के नल रहे है

आते नहीं क्यूँ मेघदूत बन कर
अब के शायद वो भी टल रहे है


5 टिप्‍पणियां:

manu ने कहा…

jal............ yeh wakai me ek badi samasya hai jise hum sab ki nasamjhi ne bhayawah bana diya hai

pr yaha to aaj baadal khoob jhoom k barse n khoob barse

Babli ने कहा…

बहुत सुंदर कविता लिखा है आपने और बिल्कुल सच्चाई का ज़िक्र किया है! इस उलझन को जल्दी ही सुलझा दिया जाए तो सभी को राहत मिलेगी तकलीफ से!

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

तप रही आग सी सारी धरती
आसमान तो जैसे पिघल रहे है !

अच्छी रचना है !

लेकिन आपकी पिछली पोस्ट (मुझे तुम मिलो ऐ अजनबी ..) ने दिल जीत लिया !

शुभकामनाएं !

आज की आवाज

kumar Dheeraj ने कहा…

तप रही आग सी सारी धरती
आसमान तो जैसे पिघल रहे है
हाय आज जहां भी ब्लाग में कुछ देखने गया हूं उसने कविताई सोच से अभिभूत किया है । उसकी सोच की दलदल में मै फसता चला गया हूं अभिन्न जी आप भी उसी में से एक है । बेहद खूबसूरत रचना है । शु्क्रिया

*KHUSHI* ने कहा…

"जल नही तो जल रहे हैं"

kavita ka title gaherai se itna kuch kah jata hain...
sundar rachana