शुक्रवार, जुलाई 31

मै जा रहा हूँ,जिन्दगी

जिंदगी तेरी खामोशी हमसे सही न जायेगी
अब दास्तान दर्द की हमसे कही न जायेगी

बेघर को देके आसरा क्यूँ एहसान किया था ?
मेहमान की तरह इतना सम्मान किया था ?

तेरा घर, तेरी गली, तेरा शहर छोड़ कर
मैं जा रहा हूँ आज सारे बंधन तोड़ कर

मेरी वफ़ा पे शायद तुमको यकीं न आएगा
तुमको भी हमसे बेवफा कहा न जाएगा

2 टिप्‍पणियां:

manu ने कहा…

itna dard kyu chupa rakkha ahi apne ???
chand lafzo me dher sara dard chupa hau hai

raj ने कहा…

मेरी वफ़ा पे शायद तुमको यकीं न आएगा
तुमको भी हमसे बेवफा कहा न जाएगा ...tu kahi bhi rahe sar pe tere ilzaam to hai...m touched....