गुरुवार, जुलाई 31







"दिल"
टूट रही है साँसे ,बैठा जा रहा है दिल,
जाने किस गुनाह की सजा पा रहा है दिल,
चुभता था कभी नश्तर ,ये सीने में लेकिन ,
आज किसी फूल सा मुरझा रहा है दिल .
कम पड़ रहा था घर उस मेहमान के लिए ,
गम जिसके लाखों अब उठा रहा है दिल...
नस नस में लहू बनके बस गई थी तुम,
आंसू लहू के बेवफा बहा रहा है दिल .
शायद तेरे कहने में ही कोई कमी 'अभिन्न'
दर्द कुछ है , बात कुछ बना रहा है दिल

4 टिप्‍पणियां:

'sakhi' 'faiyaz'allahabadi ने कहा…

Surender Kumar ji,
kisi shaayer ne kaha hai:
कहते हैं न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
हम को क्या करेंगे दिल हम ने मुद्द'आ पाया
aur ek bada maaroof sher hai:
दिल ही तो है न sung-ओ-खिश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ

Accha likh rahe hain , likhte rahiyay.
...............shubhchintak

*KHUSHI* ने कहा…

दर्द कुछ है , बात कुछ बना रहा है दिल

kitna sach likha hai apane.....bahot badhiyaaa

Prakash singh "Arsh" ने कहा…

'sure' sahab pathak dirgha me aapka swagat hai .......magar sur to tab samaj aaya jab ye sher mene padha......

कम पड़ रहा था घर उस मेहमान के लिए ,
गम जिसके लाखों अब उठा रहा है दिल...

bahot hi sundar pankti hai bahot gahari sonch hai isme....badhai...likhte rahe ...


regards
"Arsh"

Popular India ने कहा…

http://popularindia.blogspot.com/2008/08/blog-post_17.html

http://popularindia.blogspot.com/2007/11/blog-post_30.html#links

दिल का दर्द वही जाने जिस पर बीतता हो
वह क्या जाने इसका दर्द जिसने दिल को ही न जाना हो

http://popularindia.blogspot.com/2007/12/blog-post_09.html